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अफवाहों से गांधीजी को बचाना अब हमारी जिम्मेदारी

  अफवाहों से गांधीजी को बचाना अब हमारी जिम्मेदारी : अवधेश पांडे
     

महात्मा गांधी होना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, इसलिए नहीं कि गांधी की 150 वीं सालगिरह है। बल्कि इसलिए कि आज के इस अनुदार और अशांति के दौर में हमें पहले से कहीं ज्यादा जरूरत आज गांधीजी की है। क्योंकि जिस वक्त में दमन बहुत ज्यादा होता है उस वक्त में ही सबसे ज्यादा उदारता  की बातें होती हैं। इस धोखाधड़ी को पहचानना सबसे कठिन काम होता है। दिखावटी उदारता में छिपे धोखे को पहचानना एक तरह से अपने समय के सत्य को पहचानना है। गांधीजी ने अपने समय के सत्य को पहचाना था और उसे बोलने की हिम्मत जुटाई थी। इसलिए आज हमें एक बार फिर उनके विचारों, उनकी सक्रियता, उनके साहस और उनके सिद्धांतों की सबसे अधिक आवश्यकता है।

इतिहास व्यक्तियों को नहीं उनके व्यक्तित्व  की परछाई को नापता है। कोई भी व्यक्ति इतिहास के कितने लंबे कालखंड पर प्रभाव डालता है इतिहास उसे तौलता है।

गांधीजी पर बात करने का सबसे बड़ा खतरा यह हैं कि या तो हम उनमें ईश्वरीय गुणों का समावेश कर देते हैं या उन्हें एक जादूगर की तरह प्रस्तुत करते हैं। ऐसा करने से गांधीजी हमसे बहुत दूर चले जाते हैं। और वे गणदेवता में तब्दील हो जाते हैं। इस तरह उन पर पूरी बातचीत व्यर्थ हो जाती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो अपूर्वानंद कहते हैं कि गांधी उनके अपने देश में एक अफवाह से अधिक कुछ नहीं। इस अफवाह की धुंध के पीछे छिपे गांधी को उजागर करने में किसी संस्था की रुचि नहीं, कम से कम गांधी के नाम पर बने संस्थानों की तो कतई नहीं। और यह तब है जब गांधी को जानना इतना सरल है। उनका लिखा हजारों पृष्ठों वाली सौ खण्डों की रचनावली में मौजूद है.उनके सचिवों महादेव देसाई और प्यारेलाल की डायरियां भी मौजूद हैं।

लेकिन गांधी को जानना दो कारणों से मुश्किल है: धर्मनिरपेक्ष भारत को लेकर नाराज़गी और दूसरे अहिंसा के सिद्धांत को लेकर क्षोभ या संशय। यह इसके अलावा है कि गांधी प्रश्नों से परे श्रद्धा की आभा में घिरे हुए हैं। श्रद्धा और घृणा की धुंध और धुएं को हटाए बिना गांधी को जानना कठिन होगा।

अपने ही देश में अफवाहों से घिरे इस महामानव को बचाना अब हम और आप जैसे प्रबुद्ध लोगों की जिम्मेदारी है। हालांकि 2010 से 2014 तक सक्रिय फेसबुकिया टोलिया अब हमारे गांधी को जानने के अभियान के आगे पस्त हो चुकी हैं । यह गांधीवाद की बहुत बड़ी जीत है।


हंगरी के प्रसिद्ध नाटककार नेमेथ लास्लो अपने नाटक गांधी की मृत्यु में  लिखते हैं, ‘ अगर मैं सतही ढंग से देखूं तो गांधी दंतकथा जैसे है, ज्यादा करीब से देखूं तो उनमें ज्यादा नाटक नज़र आता है। अगर मैं सत्याग्रह वाले बरस देखूं तो एक संत का संघर्ष, अगर मैं अतीत को देखूं तो ऐसे मनुष्य की ट्रेजेडी थी जिसने बहुत ही बड़े दायित्व अपने ऊपर ले लिए थे,अगर मैं गांधीजी के अंतिम वर्षों को जोड़ दूं  तो नोआखाली में हम 77 साल बूढ़े गांधी को रास्ता तलाशते , लोगों से बहस करते, मुसलमान आक्रांता  प्रतिनिधियों बात करते, अपनी लालटेन का कांच अपने हाथ से साफ करते देखते हैं ।



नोआखाली में बहुसंख्यक दंगाई मुसलमानों से गांधी कहते हैं  मैं एक सुलहकर्ता के रूप में आया हूं जो एक ही दुश्मन को पहचानता है, और वो दुश्मन है – पाप… क्योंकि मकतूल तो सिर्फ मरता है, क़त्ल होता है, लेकिन पापी कलंक में डूब जाता है । इसलिए मैं आपसे हिंदुओं के प्राणों की ही नहीं, इस्लाम की आबरू को भी बचाने का आव्हान करता हूं।’

लोग जब गांधीजी से नोआखाली में पूछते हैं क्या खोजने आये हो यहां? तो गांधी जवाब देते हैं- इंसान।



लेकिन  समझने की  बात यह है कि न तो नोआखाली में,  न हीं  कलकत्ता में कोई गांधी के साथ है। बड़े बड़े नेता जो गांधी के दाएं बांए रहते थे, जिस आदमी जिसकी उंगली पकड़कर वे बड़े हुए , जिसकी छत्रछाया में खड़े होने से उनका अस्तित्व बना वे सब दिल्ली में जमा हैं जहां वाइसराय माउंटबेटन  के साथ सत्ता की भागीदारी की चर्चा हो रही हैं। गांधी नोआखाली में बैठे यह अपेक्षा  कर रहे थे कि कोई मुझे जानकारी तो दे कि दिल्ली में क्या हो रहा है?

जब वे लौटकर दिल्ली आते हैं तब तक माउंटबेटन से सब कुछ तय हो गया है। गांधी को अहसास तो है कि उनके पीठ पीछे कुछ तो हुआ है  लेकिन कोई खुलकर बता नहीं रहा कि क्या हुआ है? बहुत ही अजीब सा रुलाने वाला प्रसंग है। बताते हुए गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत लिखते हैं कि-




कांग्रेस ने विभाजन के प्रस्ताव पर सहमति दे दी है। उसका कागज तैयार हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मौलाना आजाद के हस्ताक्षर हैं, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में जिन्ना के हस्ताक्षर हैं, वाइसराय के रूप में माउंटबेटन के हस्ताक्षर हैं और उसकी एक कॉपी गांधीजी के पास पहुंची है। रात का समय है गांधी भंगी कालोनी में हैं। गांधीजी ने उस कागज को मोड़कर लालटेन के नीचे रख दिया है। मौलाना आजाद उनके पास पहुंचते हैं। गांधी पूछते हैं ''क्यों मौलाना सुन रहा हूँ कि तुम लोगों ने सब बातें तय कर ली हैं।'' मौलाना कहते हैं किसने कहा आपसे? आप बापू ऐसा सोच कैसे सकते हैं ? हम लोग आपसे बगैर पूछे एक कदम भी बढ़ते हैं क्या? अगर किसी को कुछ करना था तो इतना ही कि लालटेन के नीचे रखे कागज को खींचकर मौलाना के हाथ में दे देना था। 

लेकिन गांधी ने ऐसा नहीं किया। गांधी बहुत बड़े आदमी थे दुनिया उन्हें राष्ट्रपिता यूंही नहीं कहती। पिता बनना ही बहुत कठिन काम है राष्ट्रपिता बनना तो बहुत ही कठिन काम है। गांधी राष्ट्रपिता थे इसीलिए उन्होंने लालटेन के नीचे रखे कागज के टुकड़े को मौलाना को नहीं दिया। क्योंकि मौलाना की इज्जत को संभालने का जिम्मा भी गांधी का था।

अब आपकी समझ में आया होगा कि गांधी के जाने के बाद हम अचानक इतने बोने क्यों हो गए? 

अकबर इलाहाबादी का शेर है-

मुस्ते खाक हैं मगर आंधी के साथ हैं। 
बुद्ध मिया भी हजरते गांधी के साथ हैं।

मुस्ते खाक मतलब एक मुट्ठी धूल जब आंधी में उड़ती है तो ऊंची पहुंच जाती है। तो हम जितने भी बुद्ध मिया थे वे गांधी की आंधी में बड़े हो गए।  जहां गांधी की आंधी गिरी हम सब ओंधे मुंह गिरे।


गांधी माउंटबेटन से मिलते हैं। वे माउंटबेटन से कहते हैं कि ठीक है आपने जो भी तय कर लिया है पर आप से अनुरोध है कि आप जल्दवाजी न करें । माउंटबेटन कहते हैं कि बापू मुझे कोई जल्दी नहीं है मुझे तो ब्रिटिश सरकार ने एक कलेण्डर दिया है। उसी कलेण्डर के अंदर मुझे अपना काम खत्म करना है। मुझे कोई जल्दी नहीं। यानी माउंटबेटन अप्रत्यक्ष रूप से कह रहे हैं कि आपके कहने से मेरा शिड्यूल नहीं बदलेगा।



इसके बाद गांधी कांग्रेस कार्यसमिति में कहते हैं कि ठीक है आपने सबकुछ तय कर लिया और मैं आपसे यह नहीं कहूंगा कि आप अपना फैसला बदलिए लेकिन आप मेरी एक बात तो मान सकते हैं कि आप माउंटबेटन से जाकर कहें कि वे मुझको विभाजन के मसौदे पर राजी करें में सारी बाजी पलट दूंगा। एक तरह से गांधी  ब्लेंक चेक मांग रहे थे लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि चेक तो पहले ही काटा जा चुका है।


ऐसी स्थिति में गांधी निराश होकर अपने आप से बातें करने लगते हैं कि मैंने तो अपनी लाश पर होकर विभाजन की बात कही थी लेकिन अब मैं इस स्थिति में आ गया हूँ जहां कोई मेरे साथ नहीं। अगर ऐसी स्थिति में कोई उपाय अगर मैं करता हूँ तो मेरी लाश की जगह हजारों लाशें बिछ जाएंगी और कदम उल्टे पड़ जाएंगे।

इसलिए गांधी अहिंसा में एक कदम पीछे ले जाते हुए  अपनी अगली अहिंसक रणनीति पर विचार करने लगते हैं। इस बीच गांधी का आजादी के बाद पहला जन्मदिन आता है, 2 अक्टूबर 1947  और गांधी को बधाईयों का और ग्रीटिंग्स कार्ड्स का, फूलों का सिलसिला शुरू हो गया। लेडी ओर लार्ड माउंटबेटन गांधी के पास पहुंचे और गांधी को बधाई दी।
गांधी ने पूछा-

‘’ अपने जीवन के 78 वें जन्मदिन पर बधाइयां मिल रही हैं. मगर मैं अपने आप से पूछ रहा हूं: इन तारों का क्या फ़ायदा? क्या ये सही नहीं होता कि मुझे शोक संदेश दिए जाते? … एक वक्त था जब मैं जो भी कहूं, लोग उसपर अमल करते थे. आज मैं क्या हूं? मरुस्थल में एक अकेली आवाज़। जिस तरफ़ देखूं, सुनने को मिलता है कि हिंदुस्तान की यूनियन में हम मुसलमानों को बर्दाश्त नहीं करना चाहते. आज मुसलमान हैं, कल पारसी, ईसाई, यहूदी, तमाम यूरोपीय लोग… इस तरह के हालात में इन बधाइयों का मैं क्या करूं?’’


12 जनवरी 1948 को गांधी फैसला कर लेते हैं कि अब उनकी अंतिम परीक्षा का वक्त है। 12 जनवरी की शाम को प्रार्थना सभा में एक वक्तव्य पढ़ते हैं कि
‘’कल सुबह से मेरा अनिश्चितकालीन उपवास शुरू होगा। पिछले कई दिनों से मेरी एक नन्नी सी आवाज मेरे मन में लगातार दस्तक दे रही थी, लेकिन मैंने अपने कान बंद कर लिए थे कि कहीं यह शैतान की पुकार न हो। लेकिन आज वह आवाज तेज हो गयी है और अब वह मुझसे कह रही है कि मुझे उपवास करना चाहिए। क्योंकि मैं एक अहिंसक हूँ और अहिंसक व्यक्ति लाचार हो नहीं सकता, वह असहाय नहीं हो सकता इसलिए मैं हार नहीं मान सकता और इसी वजह से मैं अपने आपको इखरात (सूली) पर चढ़ा रहा हूँ। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि मुझ में ही कोई कमी हो।‘’




13 जनवरी को गांधी अनिश्चित कालीन उपवास पर चले गए। एक 78 साल का आदमी उपवास कर रहा था जिसकी देह थक चुकी थी। नोआखाली,कलकत्ता और बिहार में पैदल पैदल घूमते हुए। उस थकी हुई देह और जख्मी रूह को लेकर उन्होंने उपवास किया और पूरी दुनिया में चिंता की लहर दौड़ गयी। इस बार लोगों को लगा कि गांधी उपवास से उबर नहीं पाएंगे।


उपवास 6 दिन चला। 17 जनवरी को दिल्ली के लोगों ने जगह जगह गांधी के समर्थन में जुलूस निकाले। हिंदुओं ने भरोसा दिलाया कि मुसलमानों को वापस उनके घरों में जाने दिया जाएगा। 17 तारीख को ही दिल्ली के लोगों ने गांधी के सामने एक संकल्प पत्र रखा और कहा कि हम दिल्ली में अमन कायम करेंगे। आप उपवास तोड़ दीजिए, आपकी जान कीमती है।18 जनवरी को गांधी ने इस संकल्प पत्र को स्वीकार किया औऱ उपवास तोड़ा। 20 तारीख को गांधी पर हमला हुआ। 30 तारीख को गांधी मारे गए।18 को कहा गया कि आपकी जान कीमती है, 20 को जान लेने की कोशिश की गई, 30 को जान ले ली गयी।



गांधी की जान कीमती थी, लेकिन कई लोगों के लिए गांधी का बने रहना कहीं ज्यादा खतरनाक था, जिनके लिए खतरनाक था उन्होंने गांधी को खत्म कर दिया। और आज 70 साल बाद आज हम यहां गांधी को याद कर रहे हैं। गांधी की हत्या  30 जनवरी को 5 बजकर 17 मिनट पर हुई।


गोडसे ने गांधी को मारा।  उस तारीख के साढ़े 22 महीने बाद 15 नवंबर. ,1949  को उसे फांसी चढ़ाया गया था। इस आजाद देश की पहली फांसी थी वो। कोर्ट केस चला था लंबा। किसने सोचा था कि एक दिन ये मुल्क ‘गांधी मर्डर केस’ का ट्रायल भी देखेगा! ऐसा भी कोई दिन आएगा जब गांधी की हत्या हो जाएगी!


गांधीजी की हत्या की साजिश के अभियोग में 27 मई 1948 को 8 आदमियों पर मुकदमा दर्ज हुआ। आप्टे, नाथूराम, गोपाल गोडसे, मदनलाल पाहवा, करकरे, सावरकर, परचुरे और दिगम्बर बड़गे का नौकर। सावरकर को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।
शुरू से ही नाथूराम ने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली कि उसने यह हत्या राजनीतिक उद्देश्य से की है।

एक प्रसंग है कि गांधी अपनी हत्या से एक दो रोज पहले भारत और पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी खत्म करने पाकिस्तान जाना चाहते थे। वे दरअसल भारत और पाकिस्तान की सीमा रेखा को भारत नेपाल सीमा की तरह बनाना चाहते थे। वे नही चाहते थे कि भारत के पड़ोस में एक स्थायी शत्रु हमेशा के लिए बन जाये।इसलिए उन्होंने शुशीला नैयर को जिन्ना के पास भेजा कि वे बिना पासपोर्ट और वीसा के पाकिस्तान आना चाहते हैं। अगर जिन्ना को लगता है कि यह गलत और गैरकानूनी है तो वे उन्हें गिरफ्तार कर सकते हैं । जब शुशीला नैयर जिन्ना के पास पहुंचती हैं तो जिन्ना कहते हैं कि आप गिरफ्तारी की बात करती हो गांधी  पाकिस्तान में जहां चाहें वहां जा सकते हैं। पर मेरी यह गुजारिश है कि यहां गांधीजी की सुरक्षा का जिम्मा पाकिस्तान की पुलिस करेगी क्योंकि पाकिस्तान में यदि गांधीजी को कुछ हो गया तो पाकिस्तान का नक्शे से नाम मिट जाएगा। दुर्भाग्य से गांधी ऐसा नहीं कर सके और एक छोटा सा पाकिस्तान हमारे लिए हमेशा के लिए एक समस्या और चुनाव का मुद्दा बन गया।


गांधी हिंदुस्तान की सरहद से  बिना पासपोर्ट व वीसा के निकल कर पूरी दुनिया में  घूम रहे हैं। तो इस सूरत में उन्हें इस मुल्क से निकाल भी दिया जाए तो वे फिर ज़िंदा हो जाते हैं।  वे हर जगह दिखते हैं- संयुक्त राष्ट्र में, दक्षिण अफ़्रीका में, अमेरिका में, पोलैंड में, विश्व के शांति आंदोलनों में और हर वेइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ और हर ताक़तवर सत्ता के ख़िलाफ़ खड़े दिखते हैं।  ताकत, हिंसा व नफरत के सहारे वे समझ नहीं आते और सच्चे मन से, प्रेम और करुणा से वे सहज समझ आ जाते हैं। उनकी स्मृति को किसी राज्यसत्ता के संरक्षण की ज़रूरत नहीं है हां सत्ताओं को ज़रूर गाँधी की ज़रूरत है।


अवधेश पांडे
2 अक्टूबर 2019







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